दोस्तों आज मै एक आलेख लिखने जा रहा हूँ , जिसका नाम है - बच्चो से उनका बचपना न छीने बच्चे भगवान के रुप होते है। वे देश के भविष्य हैं बाल श्रम और मोबाइल की भट्ठी में झोंक कर उनसे उनका बचपन न छीना जाए। दोस्तों हमारे समाज में नौकरीपेशा माता-पिता के लिए अपने बच्चों को दिनभर व्यस्त रखना या किसी के भरोसे छोड़ना एक फायदे का सौदा होता है क्योंकि उनके पास तो अपने बच्चो के लिए समय है ही नहीं। बच्चों में अपनेपन की भावनाएं नष्ट होती जा रही हैं। अकेलेपन और मानसिक रोगों की चपेट में सभी हैं, क्योंकि सोशल मीडिया द्वारा दूर-दराज के रिश्तेदारों और अनजान लोगों से संबंध तो सभी स्थापित करने में लगे हैं, पर जो रिश्ते पास हैं, साथ हैं उनसे दूर होते जा रहे हैं। बच्चे चिरचिरेपन हो रहे है। इस बनावटी दुनिया में बच्चे भटक रहे है। दोस्तों बचपन में बिना समझ के भी, हम कितने सच्चे थे, वो भी क्या दिन थे, जब हम बच्चे थे।कोई तो रूबरू करवाए बेखौफ बीते हुए बचपन से.. मेरा फिर से बेवजह मुस्कुराने का मन है,लेकिन ये सब अब देखने को ही नहीं मिलता है। इस पर भी माँ-बाप उन्हें गिल्ल...
दोस्तों वर्तमान में हम लोग जितनी तेज से आगे बढ़ रहे है, उतनी ही तेजी से हमारी खुशियाँ , रिश्ते छूट रहे है, इस ब्लॉग के माध्यम से मैंने जीवन की अनेक समस्याओ के बारे में लिखा है।