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व्यस्त रहो मस्त रहो

"ओफ्फो बिस्तर की चादर कितनी बार भी सही करो फिर सलवट पड़ जाती"या "सोफे के कवर कुछ सेट से नहीं लग रहे"ये माथे पर बाल की जो लट है कुछ जम सी नहीं रही" ये उदाहरण है हर चीज़ को परफेक्शन से देखने के,ये चेहरे मोहरे से लेकर बैंक बैलेंस तक में हो सकता है। लोगो के दिमाग में हर काम का एक परफेक्शन लेवल होता है।किसी को कमरे का फर्श चमकता चाहिए किसी को दीवार और छत भी दागों से रहित।जब कोई अपने परफेक्शन लेवल तक पहुँच ना पाए और उसे पाना एकमात्र उद्देश्य बना लेता है तो जन्म लेते है बहुत से डिसऑर्डर। पहला व्यक्ति खुद को परफेक्शनिस्ट बनाने में लगा रहता है।पढ़ने में अव्वल तो मुझे डांस भी आना चाहिए।ऑफिस में टॉप पर तो मुझे घर में भी 10 आउट ऑफ 10 चाहिए।ये लोग खुद को ही मोटीवेट करते है औऱ अचीव न कर पाने पर खुद ही निराश हो जाते है। दूसरा व्यक्ति खुद के साथ अपने खास रिश्तों से परफेक्शन की उम्मीद रखता है,ऐसे लोग अपने खास लोगों में या तो हंसी के पात्र बनते है या नफरत के क्योंकि ये हर बात, हर चीज़ में कमी निकालते हैं। तीसरा ये सबसे खतरनाक केटेगरी होती है,दूसरे शब्दों में जिन्हें हम साइको कहत...